बेटी दिवस

**बेटियों से आबाद होता है घर**

अलीगढ़ :   बेटी है तो घर और परिवार है। बेटी है तो यह संसार है बेटी दिवस के अवसर पर मैं बताना चाहूंता हूं कि भारत में बेटियों को महत्व देने के संदर्भ में सन 2007 से बेटी दिवस हर साल सितंबर माह के चौथे रविवार को मनाने की परंपरा बनी हुई है जबकि वर्ल्ड डॉटर्स डे 28 सितंबर को मनाया जाता है किंतु इसके कुछ अपवाद हैं, कुछ देशों में 25 सितंबर को तो कुछ देशों में 1 अक्टूबर को वर्ल्ड डॉटर्स डे मनाया जाता है।

भारत में एक लड़की होने के कलंक को दूर करने के लिए, लड़कियों के प्रति अव्यावहारिक पुरातन सोच से मुक्ति प्राप्त हेतु सबसे पहले डॉटर्स डे की शुरुआत 2007 में की गई थी। इस बात से तो हम सभी वाकिफ हैं कि दुनिया भर के अन्य देशों के विपरीत भारत में बेटियों के साथ समान व्यवहार नहीं किया जाता है। उन्हें अक्सर एक बोझ के रूप में देखा जाता है , दहेज की अवधारणा भारत में अभी भी कायम है भले ही इसके खिलाफ कानून हैं इसके बावजूद दुल्हन के परिवार से अपेक्षा की जाती है कि वे मोटी रकम/ पैसे और महंगे गहने या उपहार दें साथ ही साथ एक फैंसी शादी भी करें । परंपरा में दोष देखने के बजाय यह बेटियों के लिए एक सजा जैसा बन जाता है। भारत में कन्या भ्रूण हत्या भी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है और कुछ मामलों में बेटियों को जन्म देने वाली महिलाओं को भी बहिष्कृत कर दिया जाता है उन्हें अपमानित किया जाता है उन्हें दोयम दृष्टि से देखा जाता है,कभी कभी तो उन्हें घर से निकलने के लिए विवश किया जाता है। अगर बड़े शहरों को छोड़ भी दें तो यह अवधारणा/मुद्दा अभी भी ग्रामीण और साथ ही भारत के अन्य हिस्सों में मौजूद है । इसके अलावा भले ही कुछ बेटियों से प्यार करें मगर बेटी की चाह मैं वह और बच्चे पैदा करने से भी गुरेज नहीं करते हैं । वैदिक कालीन दोषपूर्ण सोच कि पितृ ऋण से मुक्ति प्राप्त करने के लिए बेटा का होना अनिवार्य है की परंपरा देश में लिंग भेद की भावना को जन्म देती है। जबकि संविधान के अनुच्छेद 15 में पर्याप्त व्यवस्था है कि कोई भी घर परिवार समाज लिंग भेद नहीं करेगा। इसी पुरानी परंपरागत वैदिक सोच को खत्म करने के लिए बेटी दिवस 2007 से मनाना शुरू किया है।

बेटी दिवस उन खुशियों के सम्मान में मनाया जाता है जो बेटियां अपने आसपास के लोगों के जीवन में लाती हैं चाहे वह माता-पिता हो दादा-दादी हो भाई बहन हो शिक्षकों या फिर डॉक्टर इंजीनियर फोर्स हो लड़कियां लड़कों के बराबर है और उन्हें उनकी क्षमता पर दिखाने के अवसर मिलने चाहिए न कि लिंग भेद कर उन्हें अवसर प्रदान करने से दूर रखा जाए। पर बेटियों को समान अवसर प्रदान करने पर भी समाज और सरकार को मंथन करना चाहिए। शिक्षा हो, रोजगार हो या और कोई काम सभी को समान अवसर मिलने चाहिए। डॉटर्स डे पर जिम्मेदार नागरिक बेटियों के महत्व के बारे में समाज में जागरूकता लाने का प्रयास करते हैं। बेटियां आज किसी भी बात पर बेटों से कम नहीं है । उनकी शिक्षा-दीक्षा अगर अच्छे से दी जाए उनको संस्कार अच्छे से दिए जाएं तो वह हर मुश्किल को पार कर के माता पिता का नाम रोशन कर सकती हैं । बेटी किसी भी मामले में बेटों से कम नहीं है उन्हें भी बेटों के बराबर अवसर प्रदान किए जाएं। वैसे तो बेटियों को हर रोज महत्व देना चाहिए। बेटी दिवस उन लोगों के लिए है जो बेटियों के प्रति नकारात्मक ऊर्जा/सोच रखते हैं। बेटी जगत जननी होती है इसे एक दिन सेलिब्रेट करना संभव नहीं है फिर भी यह एक दिन उनके सम्मान में मनाया गया है इस दिन बेटियों को विशेष रूप से सेलिब्रेट किया जाता है। यह दिन खासकर बेटियों के लिए है – माता-पिता अपनी बेटियों के लिए खुश होते हैं जिन्होंने बेटी होकर कुछ अलग करके दिखाया और अपने माता-पिता का नाम रोशन किया डॉटर्स डे उन्हीं के लिए मनाया जाता है।

भारतीय समाज में बेटियों के प्रति गलत अवधारणाएं भी व्याप्त हैं जैसे माता-पिता के मन में यह रहता था कि बेटी होगी तो उसकी शादी करने के लिए इतना भारी भरकम दहेज कैसे देंगे , पूरी बात उसकी सुरक्षा के लिए हमेशा हमें फिक्र करनी होगी बेटी ने कहीं कुछ गलती कर दी या इसके साथ किसी ने कुछ गलत कर दिया तो बेटी है इसलिए हमारी ही नाक कटेगी । यह भी समाज की गलत धारणा है जो समाज में व्याप्त है पाल पोस कर बड़ा करेंगे और किसी और के घर चली जाएगी वह तो पराया धन है। यह हमारी निम्न/तुच्छ/ओछी मानसिकता/ सोच का ही प्रतीक है । बुढ़ापे में रोटी तो बेटा ही देगा हमारा वंश आगे बढ़ाएगा । बेटी क्या काम की यह भी एक गलत अवधारणा है क्योंकि ” बेटियों से आबाद होता है घर परिवार ,अगर यह न होती तो थम जाता पूरा संसार।”

डॉटर्स डे मनाने के पीछे मूल उद्देश्य है खास करके भारत के संदर्भ में -भारतीय समाज और परिवारों में व्याप्त लिंग भेद की भावना को दूर करना। वैदिक कालीन पुरुष प्रधानता की भावना को खत्म करना। बेटा ही वंश चलाएगा की भावना को दूर करना। बेटी परिवार पर बोझ होती है या पराया धन है समाज की ओछी सोच को दूर करना। जन्म से पूर्व भ्रूण हत्या करने के विरुद्ध जागरूकता पैदा करना। भ्रूण हत्या के मामले में महिला महिला की दुश्मन होती है देखा गया है। पुरुषों से अधिक महिलाओं की बेटा प्राप्त करने की भूख उन्हें भ्रूण हत्या करने पर विवश करती हैं। घरेलू हिंसा और दुष्कर्म से बचाना बेटी बोझ नहीं बल्कि परिवार का अहम हिस्सा है की विचारधारा को बढ़ावा देना । “बेटी बेटा से कम नहीं सभी क्षेत्रों में बेटियां अवसर मिलने पर लड़कों से बेहतर काम कर रही है” इसलिए बेटियों को घर परिवार और समाज में उचित महत्व देने के उद्देश्य से डॉटर्स डे हर साल सितंबर माह के चौथे रविवार को मनाते हैं।

बेटी दिवस के अवसर पर हर मां बाप को लड़की के जन्म पर गौरवान्वित महसूस करना चाहिए । बेटियों को बेहतर माहौल प्रदान करना चाहिए उन्हें सम्मान देने के हर संभव प्रयास करने चाहिए बेटियों के प्रति अव्यावहारिक सोच को समाप्त कर देना चाहिए क्योंकि आज बेटियां बेटों से किसी भी मायने में कम नहीं है।

संवैधानिक कानून जैसे दहेज रोकने संबंधी ,घरेलू हिंसा और भ्रूण हत्या पर बने कानून को व्यवहार में लागू करना चाहिए सरकार इन कानूनों को अमल में लाने के लिए स्वयं पर समाज और परिवार में लागू करने का माहौल उत्पन्न करें। समाज को विश्वास में लेकर इन कानूनों को लागू किया जा सकता है शिथिल कढ़ी के प्रति सरकार सख्ती से पेश आए तो निश्चित रूप से कानूनों को लागू करके समाज में लिंग भेद की अवधारणा को दूर किया जा सकता है । बेटियों को सम्मान पर्याप्त मात्रा में दिया जा सकता है। हम बेटियों को सम्मान देकर ही उनसे सम्मान करने की अपेक्षा कर सकते हैं।

लेखक

सत्य प्रकाश

(शोधार्थी )

इतिहास विभाग, मंगलायतन विश्वविद्यालय अलीगढ़।

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