देवउठनी एकादशी (सोमवार, 15 नवंबर) पर तुलसी के साथ शालिग्राम जी का विवाह कराने की परंपरा है। शालिग्राम काले रंग के चिकने, अंडाकार पत्थर होते हैं। ये नेपाल में गंडकी नदी के तल में मिलते हैं। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार अगर शालिग्राम घर में रखना चाहते हैं तो इसकी प्राण-प्रतिष्ठा करने की जरूरत नहीं है। शालिग्राम जी भगवान विष्णु का अवतार माने जाते हैं।
कई तरह के होते हैं शालिग्राम
शालिग्राम कई के होते हैं। कुछ शालिग्राम अंडाकार होते हैं, कुछ शालिग्राम में एक-एक छेद होते हैं। कुछ पत्थरों पर शंख, चक्र, गदा या पद्म के शुभ चिह्न बने होते हैं। शालिग्राम की पूजा तुलसी के बिना पूरी नहीं होती है।
तुलसी और शालिग्राम विवाह करवाने से कन्यादान करने के समान ही वही पुण्य मिलता है। पूजा में शालिग्राम का अभिषेक करें। चंदन लगाकर तुलसी दल अर्पित करना चाहिए। जिस घर में शालिग्राम हो, वह तीर्थ के समान होता है। जिस घर में शालिग्राम का रोज पूजन होता है, वहां वास्तु दोष और अन्य बाधाएं समाप्त हो जाती हैं।
पुराणों में है शालिग्राम जी का वर्णन
स्कंदपुराण के कार्तिक महात्म्य अध्याय में बताया गया है कि शिव जी ने भी शालिग्राम की स्तुति की है। ब्रह्मवैवर्तपुराण के प्रकृति खंड अध्याय में बताया गया है कि जहां शालिग्राम की पूजा होती है, वहां भगवान विष्णु के साथ भगवती लक्ष्मी भी निवास करती हैं। शालिग्राम शिला का जल जो अपने ऊपर छिड़कता है, उसे तीर्थों में स्नान के समान पुण्य मिलता है। जो व्यक्ति रोज सुबह शालिग्राम का जल से अभिषेक करता है, उसे अक्षय पुण्य मिलता है।
