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बदायूँ शिखर
रिपोर्ट- विकस आर्य
पत्रकारों को तो अक्सर फर्जी होने की बात कही जाती है लेकिन एक कड़वा सच यह भी है कि कितने व्यापारी व अन्य संगठन ऐसे हैं जो टाइप की दुकान पर जाकर लंबा चौड़ा प्रेस नोट टाइप करा अखबारों में भिजवा देते हैं। सुबह जब खबर छपती है तो उसे फेसबुक या व्हाट्सएप पर डालकर शासन प्रशासन व समाज पर अपना रौब जमाते हैं। यह कड़वा सच है लेकिन ज्यादातर पत्रकार इसे समझ नहीं पाते और ऐसे लोगों की प्राथमिकता से खबरें प्रकाशित कर देते हैं।
ऐसे ढोंगी लोगों से पत्रकारों को सचेत हो जाना चाहिए? दिलचस्प बात है कि पत्रकारों को मूर्ख बनाने वाले खबरों के ये ठेकेदार पीठ पीछे मीडिया कर्मियों को उठाई गिरा और लो अस्तर का बताकर सम्मानित पत्रकारों की मजाक उड़ाते हैं ऐसे ढोंगी लोगों की खबर प्रकाशित करने में पत्रकार खुद भी दोषी हैं। क्योंकि यह लोग न तो अपनी बैठक में किसी पत्रकार को आमंत्रित करते हैं और ना ही इस बात का कोई प्रमाण इनके प्रेस नोट पर होता है कि वास्तव में उनके कार्यालय पर संबंधित संगठन की बैठक हुई है। अपना भाषण डाला और अंत में रजिस्टर में लिखे अपने अर्जी फर्जी साथियों के नाम बैठक में शामिल होने का दावा करते हुए लिख देते हैं।
मजेदार बात यह भी है कि अक्सर इस तरह के लोग अधिकारियों के यहां भी जब चाहे साथियों को लेकर ज्ञापन देने पहुंच जाते हैं ज्ञापन देने का भी मकसद यही होता है कि अधिकारियों से रूबरू होकर उनकी निगाहों में एक मजबूत संगठन के पदाधिकारी के रूप में बने रहे कुल मिलाकर यह लोग अफसरों को भी गुमराह करते हैं जो पत्रकार ऐसे लोगों की कारगुजारी ओं को जानते हैं वे इनकी खबरें कभी नहीं छापते । पत्रकारों को भी चाहिए कि अपनी गरिमा बनाए रखने के लिए ऐसे चापलूस तथाकथित संगठनों के पदाधिकारियों को कोई भाव ना दें इसी में पत्रकारों का सम्मान है।
