वाशिंगटन : काबुल हवाई अड्डे पर हुए हमले में 13 अमेरिकी सैनिकों की मौत के बाद अमेरिका में भड़के जनमत को शांत करने के लिए राष्ट्रपति जो बाइडन ने सख्त रुख अपनाया। उन्होंने गुस्से भरे तेवर में कहा कि जिन लोगों ने ये हमला किया, अमेरिका उनसे बदला लेगा। उन्हें ढूंढ निकाला जाएगा। शनिवार सुबह अमेरिका ने अफगानिस्तान में ड्रोन हमला किया और दावा किया कि हमलावर को मार डाला गया है। लेकिन यहां सुरक्षा विशेषज्ञों की राय है कि इससे अमेरिका की चुनौती कम नहीं हुई है।
हवाई अड्डे पर हमला आईएसआईएस-के नाम के संगठन ने की। विशेषज्ञों के मुताबिक इस हमले ने उस आशंका को साबित कर दिया है कि तालिबान के सत्ता में आने के बाद अफगानिस्तान एक बार फिर से आतंकवादी संगठनों का अड्डा बना जाएगा। आईएसआईएस-के के हमले के बारे में अमेरिका के पास पहले से खुफिया सूचना थी। आगे ऐसे और हमले की चेतावनी भी खुफिया एजेंसियों ने दी है।
विशेषज्ञों ने बताया है कि मूल संगठन आईएसआईएस के संगठित होने के एक साल बाद 2015 में आईएसआईएस-के अस्तित्व में आया था। लेकिन असल में यह अल-कायदा से निकला गुट है। इसका गठन अल-कायदा और हक्कानी गुट की पाकिस्तान की शाखाओं से निकले दहशतगर्दों ने किया था। इसके नाम में आने वाला अंग्रेजी का अक्षर के खुरासान क्षेत्र के लिए है। यह इलाका पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान और मध्य एशिया की सीमाओं तक फैला हुआ है। आईएसआईएस-के का मकसद इतने बड़े इलाके में खिलाफत यानी इस्लामी राज की स्थापना करना है।
खिलाफत कायम करने के सवाल पर ही आईएसआईएस-के का तालिबान से मतभेद है। आईएसआईएस-के दुनियाभर में खिलाफत कायम करना चाहता है, जबकि तालिबान अपनी गतिविधियां अफगानिस्तान में सीमित रखना चाहता है। जब तालिबान ने अमेरिका से बातचीत का फैसला किया था, तब से आईएसआईएस-के उसका बैर और बढ़ गया।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के समय जब अमेरिका ने बातचीत शुरू की, तो उसने तालिबान के सामने ये शर्त रखी थी कि वह अफगानिस्तान की जमीन पर अल-कायदा और दूसरे गुटों को सक्रिय नहीं होने देगा। लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञों को शक है कि तालिबान में आईएसआईएस-के से निपटने की इच्छाशक्ति या क्षमता है। अमेरिकी विशेषज्ञों का कहना है कि अतीत में तालिबान ने आईएसआईएस-के और हक्कानी नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई की है। लेकिन नए दौर में उसका क्या रुख रहेगा, इस बारे में अभी कोई स्पष्टता नहीं है।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि हक्कानी नेटवर्क के संबंध आईएसआईएस-के और तालिबान दोनों के साथ हैं। उसमें कहा गया था कि हक्कानी नेटवर्क की कोई अपनी विचारधारा नहीं है, इसलिए वह साथ-साथ विरोधी संगठनों के साथ संपर्क बनाए रखता है। लेकिन आईएसआईएस-के से जुड़े दहशतगर्द विचारधारा के मामले में कट्टरपंथी हैं। आतंकवादी कार्रवाइयों के मामले में वे प्रशिक्षित और तकनीकी क्षमता से लैस हैं।
सिंगापुर स्थित एस राजारत्नम स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में आतंकवाद विशेषज्ञ राफेलो पैंतुची ने ब्रिटिश अखबार द फाइनेंशियल टाइम्स से कहा है कि अब तालिबान के सत्ता में आने का लाभ उठा कर आईएसआईएस-के अपनी पहचान ऊंची करने की कोशिश करेगा। ऐसा करने से उसे अधिक चंदा और नए कार्यकर्ता मिलेंगे। उन्होंने कहा- ‘आतंकवाद हमेशा ही व्यवस्था विरोधी होता है और अब अफगानिस्तान में तालिबान व्यवस्था का हिस्सा है। इसलिए आईएसआईएस-के के उदय और प्रसार के लिए स्थितियां अनुकूल हैं। और संभवतया अब ऐसा ही होने की संभावना है।’
