दिल्ली, एजेंसी : कोरोना काल के दौरान देश की पुलिस को सबसे ज्यादा मशक्कत लोगों से कोविड प्रोटोकाल के पालन करवाने को लेकर हुई। जबकि इस दौरान प्रमुख शहरों में साइबर क्राइम और घरेलू हिंसा के प्रकरण सबसे ज्यादा नजर आए हैं। ये खुलासा हाल ही में लोकनीति सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज़ के सर्वे में हुआ है। सीएसडीएस ने कोविड-19 महामारी की पहली लहर के दौरान देश के दस राज्यों की पुलिस का आम लोगों से कैसा व्यवहार रहा इसे लेकर एक रिपोर्ट तैयार की हैं। इसमें संस्था ने आम लोगों से पुलिसकर्मियों के बर्ताव के बारे में विस्तार से चर्चा की है।

लोकनीति-सीएसडीएस के इस शोध के प्रमुख शोधकर्ता मंजेश राणा ने  बताया कि हमारी संस्था द्वारा कोरोना की पहली लहर के बाद अक्तूबर और नवंबर 2020 के बीच में दस राज्यों के 19 शहरों के आम लोगों और पुलिस से चर्चा कर ये रिपोर्ट तैयार की है। इस सर्वे में 40 सवाल पुलिसकर्मियों से और 40 सवाल आम लोगों से पूछे गए थे।

इस सर्वे में 79 फीसदी पुलिसकर्मियों ने कहा बताया कि पहली लहर के दौरान लगे लॉकडाउन में क्राइम का प्रतिशत जरूर कम हुआ है। जबकि 30 फीसदी पुलिस वालों ने बताया कि इस दौरान साइबर क्राइम से जुड़े मामले सबसे ज्यादा आए। वहीं 27 फीसदी पुलिसकर्मियों ने कहा कि लॉकडाउन एक में अन्य मामलों की तुलना में घरेलू हिंसा के प्रकरण सबसे ज्यादा देखने को मिले। जबकि 59 फीसदी ने कहा कि लॉकडाउन की परिस्थितियों को काबू काम करना बहुत ही कठिन काम था।

40 फीसदी पुलिसकर्मी नहीं कर पाए होम आइसोलेट

सर्वे में पुलिसकर्मियों से यह भी पूछा गया कि बतौर फ्रंटलाइन वर्कर वे सड़कों पर दिन-रात नियमों का पालन करवाने के लिए तैनात रहते थे। ड्यूटी खत्म होने के बाद क्या वे खुद को बतौर एहतियात क्वारंटीन करते थे या नहीं। इस पर 60 फीसदी पुलिवालों ने कहा कि परिवार के सदस्यों की सुरक्षा को देखते हुए वे खुद को क्वारंटीन कर लेते थे, जबकि 40 फीसदी पुलिसवालों ने बताया कि इस दौरान वे खुद को हाम आइसोलेट नहीं कर सके। जबकि 68 फीसदी पुलिसकर्मी रोज अपनी ड्यूटी खत्म कर परिवार के पास जाते थे।

40 फीसदी पुसिकर्मी चाहते थे अवकाश

इस सर्वे में 40 फीसदी पुलिसकर्मियों कहा कि अगर हमारे पास अवकाश का विकल्प होता, तो हम भी कोविड काल के दौरान छुट्टी पर परिवार के साथ रहना ज्यादा पसंद करते। जबकि 58 फीसदी ने यह कहा कि हमें कोरोनाकाल में नौकरी करने में कोई भी परेशानी नहीं हुई। 53 फीसदी पुलिसकर्मियों ने बताया कि लॉकडाउन के दौरान आरोग्य सेतु एप की मदद से उन्हें कोरोना संक्रमित व्यक्तियों की पहचानने करने में बहुत मदद मिली। जबकि 35 फीसदी ने नकारते हुए कहा कि इस एप से कोरोना काल में कोई भी मदद नहीं मिली। 78 फीसदी पुलिसवालों ने बताया कि वे पिछले साल लगे लॉकडाउन के दरमियान करीब 11 घंटे से ज्यादा काम करते थे। जबकि 27 फीसदी ने यह भी कहा वे 15 घंटे से ज्यादा काम करते थे।

प्रवासी मजदूरों को संभालने में हुई परेशानी

सर्वे में 82 फीसदी पुलिसकर्मियों ने कहा कि प्रवासी मजदूरों के पलायन के दौरान बनी परिस्थितियों को संभालने में बहुत ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ा। 49 फीसदी पुलिसवालों ने यह भी कहा कि प्रवासी मजदूरों की भीड़ को नियंत्रण करने में उन्हें बल प्रयोग तक करना पड़ा। जबकि 64 फीसदी आम लोगों का कहना था कि केंद्र सरकार को लॉकडाउन लगाने से पहले आम लोगों को थोड़ा समय देना चाहिए था जिससे लोगों और प्रवासी मजदूरों को इतनी परेशानी नहीं होती।

ट्रैवल पास को लेकर सबसे ज्यादा हुई बहस

सर्वे में 45 फीसदी पुलिस वालों ने कहा कि सड़क पर आम लोगों से सबसे जयादा बहस ट्रैवल पास को लेकर हुई। 52 फीसदी पुलिसकर्मियों ने बताया कि अमीर वर्ग के लोगों ने हमारे साथ अच्छा बर्ताव किया और कानून पालन में सहयोग किया। जबकि 24 फीसदी पुलिसकर्मियों ने कहा कि गरीब लोग ने हमें ज्यादा सपोर्ट किया।

सर्वे में यह भी सामने आया कि कोरोना के पहले लॉकडाउन के दौरान पुलिस का सबसे ज्यादा डर 57 फीसदी निम्न वर्ग, 59 फीसदी गरीब वर्ग में देखा गया था। जबकि 54 फीसदी मध्यवर्गीय लोग और 41 फीसदी अमीर लोग ही पुलिस से डरे।

कोरोना के दौरान पुलिस की छवि सुधरी

सर्वे में जब आम लोगों से पूछा कि पुलिस अपने काम और कोरोना प्रोटोकाल का पालन करने में कितनी सक्षम थी, तो 86 फीसदी लोगों ने कहा, इस दौरान पुलिसकर्मियों ने अपना काम बेहद ईमानदारी से किया। वहीं 65 फीसदी लोगों ने यह भी कहा कि इस दौरान पुलिस के बर्ताव को लेकर पुलिस की छवि आम लोगों की नजरों में थोड़ी सुधरी है। जबकि 32 फीसदी लोगों ने कहा कि पुसिल की छवि में कोई बदलाव नहीं आया है। 36 फीसदी जनता ने ये भी कहा कि पुलिस ने नियमों का पालन करवाने के लिए अपने अधिकारों का डर दिखाने की कोशिश भी की।

57 फीसदी लोग नहीं निकले घर से बाहर

लोकनीति के सर्वे में 57 फीसदी लोगों ने कहा कि पुलिस की चालानी कार्रवाई और गाड़ी जब्त करने के डर से वे घरों से बाहर निकलने से बचे। जबकि 55 फीसदी लोगों के मन में ये डर था कि अगर वे घरों से बाहर निकलेंगे तो पुलिस उनकी पिटाई कर देगी। 43 फीसदी लोगों को यह भी डर था कि पुलिस उन्हें पकड़कर कोरोना जांच के लिए अस्पताल लेकर जाएगी। जबकि 43 फीसदी लोगों को ये डर था कि बाहर निकलने और नियम तोड़ने पर पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर लेगी।

सर्वे में लोगों ने यह भी बताया कि सोसायटीज की रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन ने उन्हें बिना जरूरत के कंट्रोल करने की कोशिश की। 20 फीसदी लोगों का कहना था कि इस दौरान सोसायटी के लोगों ने अपनी मनमानी करने की बहुत कोशिश की। इससे कहीं न कही लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ा।

 

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