नई दिल्ली, एजेंसी।  चीफ जस्टिस एन वी रमण ने बुधवार को आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के बीच कृष्णा जल विवाद की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया। चीफ जस्टिस ने यह निर्णय तब लिया जब दोनों राज्यों ने कहा कि मध्यस्थता संभव नहीं है और वे कानूनी तरीके से इसका निपटारा चाहते हैं। चीफ जस्टिस एनवी रमण ने सोमवार को हुई पिछली सुनवाई में इस मामले में मध्यस्थता की वकालत करते हुए कहा था कि वह कानूनी मुद्दों पर मामले की सुनवाई नहीं कर सकते ,  लेकिन वह दोनों राज्यों के बीच मध्यस्थता कराने की व्यवस्था कर सकते हैं। चीफ जस्टिस रमण ने दोनों राज्यों के वकील को अपनी सरकारों से निर्देश लेने के लिए कहा था।

दोनों राज्यों के वकीलों ने बुधवार को बताया कि मध्यस्थता संभव नहीं है इसलिए कानूनी तरीके से इसका समाधान निकाला जाना चाहिए। जिसके बारे चीफ जस्टिस ने खुद को इस मामले की सुनवाई से अलग कर लिया। अब सुप्रीम कोर्ट की दूसरी पीठ इस मामले की सुनवाई करेगी। चीफ जस्टिस मूलतः अविभाजित आंध्र प्रदेश के रहने वाले हैं। पिछली सुनवाई में चीफ जस्टिस ने कहा था, ‘मैं दोनों राज्यों से हूं। मुझे कानूनी मुद्दों को सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं है,  लेकिन अगर दोनों राज्य मध्यस्थता के लिए सहमत होते हैं तो वह मदद कर सकते हैं।’

तेलंगाना पर पानी रोकने का आरोप

चीफ जस्टिस रमण की अध्यक्षता वाली पीठ आंध्र प्रदेश राज्य द्वारा तेलंगाना के खिलाफ एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि तेलंगाना उन्हें पीने और सिंचाई के उद्देश्यों के लिए कृष्णा नदी के पानी के उनके वैध हिस्से से वंचित कर रहा है।

याचिका में मुख्य रूप से मांग की गई है कि तेलंगाना सरकार को 2014 के अधिनियम के अनुसार अधिकार क्षेत्र को अधिसूचित करने का निर्देश दिया जाए। साथ ही  28 जून, 2021 कोतेलंगाना सरकार द्वारा पारित आदेश को निरस्त किया जाए। इसके अलावा आंध्र प्रदेश सरकार ने कई अन्य मांगें भी है।

 

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