मंगलवार, 1 मार्च को शिवरात्रि है। शिव जी की पूजा के साथ ही उनकी सीख को जीवन में उतार लेने से हमारी कई समस्याएं खत्म हो सकती हैं। शिव जी की कई ऐसी कथाएं प्रलचित हैं, जिनमें भगवान ने जीवन को बेहतर बनाने के सूत्र बताए हैं। जानिए ऐसी ही कुछ खास कथाएं…

कभी भी अपनी शक्तियों पर घमंड न करें

महाभारत की कथा है। कौरव और पांडवों का युद्ध तय हो चुका था। उससे पहले अर्जुन शिव जी को प्रसन्न करने के लिए तप कर रहे थे। वे दिव्यास्त्र पाना चाहते थे। उस समय वहां एक असुर जंगली सूअर बनकर पहुंच गया और वह अर्जुन को मारना चाहता था।

अर्जुन ने सूअर को देखा तो अपने धनुष पर बाण चढ़ा दिया। उसी समय वहां एक वनवासी आ गया। वनवासी ने अर्जुन को बाण न छोड़ने के लिए कहा। वनवासी बोला की ये सूअर मेरा शिकार है, तुम इसे मत मारो, लेकिन अर्जुन ने उसकी बात नहीं मानी और बाण छोड़ दिया। वनवासी ने भी बाण छोड़ दिया। दोनों के बाण एक साथ सूअर को लगे।

इसके बाद दोनों उस सूअर पर अपना-अपना अधिकार बताने लगे। विवाद बढ़ा तो दोनों के बीच युद्ध शुरू हो गया। बहुत कोशिशों के बाद भी अर्जुन उस वनवासी को पराजित नहीं कर पा रहे थे। जब वनवासी के बाण अर्जुन को लगे तो वह प्रहार सहन नहीं सके। अर्जुन बेहोश हो गए थे। कुछ देर बाद जब अर्जुन को होश आया तो उन्होंने मिट्टी से एक शिवलिंग बनाया और एक फूलों का हार पहनाया तो वह हार वनवासी के गले में दिखाई देने लगा।

अर्जुन समझ गए कि ये वनवासी शिव जी ही हैं। इसके बाद अर्जुन ने शिव जी की आराधना की। शिवजी भी अर्जुन के पराक्रम से प्रसन्न हुए और पाशुपतास्त्र दिया। शिव जी अर्जुन को समझाया कि कभी भी किसी को कमजोर न समझें और अपनी शक्तियों का घमंड नहीं करना चाहिए।

बिन बुलाए कभी किसी के यहां कार्यक्रम में न जाएं

कथा शिव जी और देवी सती से जुड़ी है। सती के पिता प्रजापति दक्ष शिव जी को पसंद नहीं करते थे। दक्ष ने अपने यहां एक यज्ञ का आयोजन किया। उस यज्ञ में दक्ष ने शिव जी को छोड़कर सभी को बुलाया था। जब ये बात सती को मालूम हुई तो वह बिन बुलाए ही पिता के यहां जाने लगीं। उस समय शिव जी ने सती को रोकने की बहुत कोशिश और कहा कि हमें किसी के कार्यक्रम में बिना बुलाए नहीं जाना चाहिए, लेकिन सती नहीं मानीं। यज्ञ स्थल पर दक्ष ने सती के सामने ही शिव जी का अपमान किया तो सती ने यज्ञ कुंड में कूदकर अपनी देह का अंत कर लिया था।

संतान को समाज सेवा और राष्ट्र प्रेम के संस्कार दें

शिव जी और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय स्वामी का जन्म एक जंगल में हुआ था। कार्तिकेय का पालन कृतिकाओं ने किया था। जब कार्तिकेय के बारे में शिव-पार्वती को मालूम हुआ तो उन्होंने कार्तिकेय को अपने पास बुलवाया लिया था। उस समय सभी देवता शिव जी के पास पहुंचे और बताया कि तारकासुर ने हाहाकार मचा रखा है। तारकासुर को वरदान मिला है कि उसका वध आपका पुत्र ही करेगा। आप कार्तिकेय को हमारे साथ भेजें, ताकि कार्तिकेय तारकासुर का वध करके हमारी रक्षा कर सके।

शिव जी और पार्वती के पास उनका पुत्र कार्तिकेय आया ही था और उन्होंने देवताओं के कल्याण के लिए कार्तिकेय को जाने की अनुमति दे दी। शिव जी यहां हमें ये संदेश दिया है कि अगर समाज और राष्ट्र को हमारी संतान की जरूरत हो तो उसे रोकना नहीं चाहिए। संतान को समाज सेवा और राष्ट्र सेवा के संस्कार देना चाहिए। संतान समाज सेवा और राष्ट्र सेवा के काम करेगी तो घर-परिवार को मान-सम्मान मिलेगा और वंश का नाम रोशन होगा।

जीवन साथी पर भरोसा रखें

श्रीराम सीता की खोज में जंगल-जंगल भटक रहे थे। माता सती श्रीराम को ऐसी अवस्था में देखा तो वे सोचने लगीं कि शिव जी जिन श्रीराम की भक्ति करते हैं, वह तो एक सामान्य इंसान की तरह रो रहा है, भटक रहा है, ये भगवान कैसे हो सकता है। ये बात देवी ने शिव जी को बताई तो शिव जी ने कहा कि ये सब श्रीराम की लीला है, श्रीराम पर संदेह न करें।

शिव जी के समझाने पर भी देवी सती को भरोसा नहीं हुआ। देवी सती ने सोचा कि वह श्रीराम की परीक्षा लेंगी और ऐसा सोचकर वे देवी सीता रूप धारण करके श्रीराम के सामने पहुंच गईं। श्रीराम ने देवी को पहचान लिया और प्रणाम करते हुए कहा कि देवी आप अकेले आई हैं, शिव जी कहां हैं?

ये सुनते ही सती को अपनी गलती का अहसास हो गया। जब वे शिव जी के पास लौटकर आईं तो शिव जी ये मालूम हो गया कि सती ने उनकी बात पर भरोसा नहीं किया और श्रीराम की परीक्षा ली है। इसके बाद शिव जी ने सती का मानसिक त्याग कर दिया था।

इस कथा का संदेश यही है कि हमें जीवन साथी की बात संदेह नहीं करना चाहिए। अगर पति-पत्नी के बीच भरोसा नहीं होगा तो वैवाहिक जीवन में सुख नहीं रह पाता है।

 

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